Sunday, 6 December 2015

हमें कोई गम न था बस तेरी इस दोस्ती से पहले

हमें कोई गम न था बस तेरी इस दोस्ती से पहले,
ना ही था कोई दिलेर-दिल बस तेरी आशिकी से पहले,
है ये किस्मत का तकाजा इसमे था तेरा कसूर क्या,
तेरे गम ने ही मार डाला हमें इस जिंदगी से पहले............//

मेरा दिल जल रहा है अब बारिशें तो करदे,
गर है तुझे भी प्यार तो उस चाँदनी से पहले,
मेरी खामोशियों में भी तेरे अहसास का पहल है,
छुपे हजारों गम में बस तेरी इक मुश्कान के बदले ...........//

माना की परछाइयों की उस तस्वीर पे खफा हो,
तो आवाज दो हमें भी ऐसे सिर्फ खुद को ना सजा दो,
क्या अनजान बनकर आये थे इस दिल्लगी में रहने,
देखो जरा मुड़कर ,
है दोस्तों में नाम तेरा, आज भी उस खुदा से पहले...........//

                                                     लेखक 
                                            हरिकेश सिंह "अकेला "

Wednesday, 18 June 2014

ऐ गुजरती ज़िन्दगी एहसास लाके दे।





ऐ गुजरती ज़िन्दगी एहसास लाके दे।  
क्या हुआ था ,क्यों हुआ था ,बात लाके दे।  
इन गरीबों की ख़ुशी वो रात लाके दे।  
सुन तड़पती आह को अब आस लाके दे। 
क्या हुआ था ,क्यों हुआ था, बात लाके दे। 
ऐ गुजरती ज़िन्दगी अहसास लाके दे। . 


हर सफर है रास्ता पर खो गयी मंज़िल।  
देख मुड़के तू जरा उसका कटता है कैसे दिन। 
है अँधेरी साम तो सहमा हुआ है दिल ,
है सफर गर ज़िन्दगी अंजाम ला के दे।
क्या हुआ था, क्यों हुआ था ,बात ला के दे। 
ऐ गुजरती ज़िन्दगी अहसास लाके दे।


देख कैसा हंस रहा है दूर से बैठा ,
ये गरीबों की हंसी है क्यों किया ऐसा।  
ज़िन्दगी बदनाम है क्यूँ , जा के उससे मिल।
है गरीबी शॉप तो इंसान लाके दे। 
क्या हुआ था ,क्यों हुआ था ,बात लाके दे। 
ऐ गुजरती ज़िन्दगी अहसास लाके दे।


 


लेखक---
                हरिकेश सिंह " अकेला "

Saturday, 15 February 2014

हमारी दुनियां , हमारी प्राकृति

आँखों में ममता है तेरी ,
बातों में है प्यार छुपा ,
तू धरती कि रानी है ,
करुणा कि परछाई है। 

काया तेरी जैसे बिजली ,
तपन- सी है तेरी आहट ,
चमक पड़े जो बादलों में ,
मिल जाती ढेरों राहत।  

गर्मी तेरी एक तपन है ,
बहारों में खोया बरसात ,
शीत में शीलन तड़पती ,
घोर अँधेरी जब हो रात। 

बदल तेरे घुंघरू हैं ,
जो गर्जन में  गीत ,
मौसम तेरे रूप अनेक ,
रोता साथी गाते मीत। 

हरियाली श्रृंगार है तेरा ,
फूल है तेरे आभूषण के ,
रंग बदल के अम्बर भी ,
तुझको करता विभूषण में। 

मिटटी तेरी खुश्बू सींचती ,
नदियां राह हैं तेरे पग की ,
तेरे दमन में न दाग लगे ,
तू प्राकृति है मेरे जग की ,

                              लेखक 
  हरिकेश सिंह " अकेला "

Friday, 14 February 2014

आँखों में सूरज -सी चमक ,
चंदा - सी  सूरत है तेरी ,
आगोश  भी मधुशाला है ,
फूलों - सी मूरत है तेरी। 

नयनों में कुछ गहराई ,
कुछ ख्वाब पलकों में छुपाई है ,
होंठो में मीठास का प्याला ,
साँसों में अंगड़ाई है। 

रंग सभी है प्यारे तुमको ,
किसी एक पर ना तू रह पायी है ,
पुष्प लाल गुलाब का ही क्यों ,
तेरे रूह को भाई है। 

कुछ ही दिनों में जान गया कि,
तू भी इक अनजान कहानी  है ,
हमराही है कुछ खास पालो की   ,
हर फरिस्ता मजहब कि दीवानी है। 


                            लेखक 
                  हरिकेश सिंह  " अकेला "

Sunday, 9 February 2014

है ऐसे शांत क्यों बैठा कोई अंजाम आया क्या,ये आवाजे तो दूर कि हैं कोई पैगाम आया क्या ,रातें नम हैं तेरी भी गलती माफ़ कर देना ,मोहब्बत ये तो नहीं कहती किसी पर जान दे देना। .... 



                                  हरिकेश सिंह " अकेला  "

Friday, 31 January 2014

किसी मासूम चेहरे की अदायें माफ़ ना करना ,

किसी मासूम चेहरे की
अदायें माफ़ ना करना ,

घटायें जुल्फ की होंगी
वफायें याद ना करना ,

हैं बड़ी कातिल नजर उनकी
निगाहें साथ न करना ,

कि नम होंगी जरा आँखे

"                 "

"                 "

सजायें  माफ़ ना करना …………… //


               

  ................................ हरिकेश सिंह " अकेला  "

Sunday, 1 December 2013

क्या तुम नहीं सुनोगे इन किताबों कि बातें ..


लेखक के अनुभव से  लिखी ये लाईनें उनके लिए है जो सपने तो बड़े - बड़े देखते हैं लेकिन मंजिल को खोजते हुए राहें भूल जाते हैं या फिर खुद को ही भूल जातें है ,




जीवन का एक अंग है जो ,
जीवन का एक  रंग है जो ,
हर समय की रफ़्तार है जो ,
हर पल में गिरफ्तार है जो ,
क्या तुम  नहीं बुनोगे सपनों कि कुछ रातें ,
क्या तुम नहीं सुनोगे इन किताबों कि बातें ................//


किताबों में बीते कल  की कहानी है ,
किताबों से हर घड़ी को जानी हैं ,
किताबों में हर इतिहास के पन्ने हैं ,
किताबों से हर यादें भी रंग में हैं .
क्या तुम नहीं रंगोगे कुछ पल भी तुम्हारे ,
क्या तुम नहीं सुनोगे इन किताबों कि बातें ................//


किताबों में कुछ हँसी कुछ काँटे हैं ,
किताबॉ से इक सपना लिए हर आँखें हैं ,
सपनों कि परछाई में एक ख्वाबों कि मंजिल  हैं ,
खोजते हो निगाहों में कोई राह दिखायेगा ,
इन किताबों के पन्नों में  हर मंजिल कि राहें हैं ,
क्या तुम नहीं चुनोगे अपनी मंजिल कि  राहें ,
क्या तुम नहीं सुनोगे इन किताबों कि बातें .........................//


जिंदगी को अब मोड़ दो मंजिलो कि राहों में,
हर मुश्कान तुम्हारी है ,हर लम्हो कि बाहों में ,
बुराईयां तो जमकर है सोचना क्या पलभर है, 
हमारा कल तो हमसे है ये जमाना भी कलसे है ,
हरिकेश साथी है सफ़र जिंदगी के बहारों का, 
हर समय इक है नदी जिंदगी के किनारों का,
क्या तुम भी नहीं बदलोगे इन गरीबों कि रातें ,
क्या तुम नहीं सुनोगे इन किताबों कि बातें .........................//

क्या तुम नहीं सुनोग   ................
                                                    इन किताबों कि बातें .........................//






लेखक .....................

हरिकेश सिंह " अकेला " 


Sunday, 13 October 2013

प्यासी हुयी है ज़िन्दगी अंजाम मांगती है ....॥

जज़्बात ज़िन्दगी का इन्कलाब मांगता है ,
बीती कहानियों का हिसाब मांगता है ,
इंसान हो तुम यारों इंसानियत तो समझो ,
आवाज मंजिलों का बेहिसाब मांगता है  ....॥  


डगर - डगर है आँधी , है  तूफान आनेवाला ,
समय का ये तबाही , है उमड़ के आने वाला ,
सुलग रही है ख्वाहिश, कहीं  धुआं नजर है आया ,
अगर आग है कही तो तुम जज़्बात ना  छुपाना ...॥ 


हरिकेश का सफ़र है ,पर तुम भी तो हो साथी ,
रात हो गयी है , तो  क्या दीप के हो बाती ,
पहचान तो लो खुद को, हो समय की इक रवानी ,
अहसास है लबों पे और  आँखों में ग़म का पानी ....॥ 


कटी पतंग की डोरी ,  है हाथों में तेरी आयी, 
रफ़्तार आँधियों का इक उडान मांगती है,
वो देख हरिकेश मंजिल रोशनी लिए खड़ी है, 
ना रुक अब किसी से, ना झुक अब किसी से, 
तेरी प्यासी हुयी है ज़िन्दगी अंजाम मांगती है ....॥ 



........................ लेखक 
            
 हरिकेश सिंह  " अकेला "
harikeshgt@yahoo.com

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